गर्म मैदानी क्षेत्रों के साथ-साथ अब ठंडे इलाकों में भी पनपने लगे मलेरिया के मच्छर।

हिमाचल प्रदेश में मलेरिया के मच्छर गर्म मैदानी क्षेत्रों के साथ-साथ अब ठंडे इलाकों में भी पनपना शुरू हो गए हैं। आपको बता दें कि पर्यावरण में लगातार आ रहे बदलाव के चलते मच्छर के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हो गया है। पहाड़ी इलाकों सोलन के कंडाघाट, दाड़लाघाट, अर्की, शिमला के शोघी, तारादेवी, जुन्गा और बिलासपुर में ये मच्छर साल के आठ माह पैदा हो सकते हैं और लंबे समय तक जिंदा भी रह सकते हैं। इसका खुलासा हाल ही में एक परीक्षण में हुआ है।

बताते चलें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम ने मलेरिया को लेकर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में सर्वे किया है। इसमें पाया गया है कि ठंडे क्षेत्रों में भी मलेरिया के मच्छर पैदा हो रहे हैं। टीम ने विभाग को अलर्ट रहने के लिए कहा है। वहीं, अलर्ट के बाद अब स्वास्थ्य विभाग ने जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया है। इसके लिए विशेष टीम गठित की गई है। यह टीम उन क्षेत्रों में लोगों को जागरूक करने जाएगी, जहां मलेरिया के मच्छर पनपने की आशंका है।

हिमाचल प्रदेश में लगातार मौसम बदलने से तापमान बढ़ता जा रहा है। हिमाचल के ऊपरी क्षेत्रों में भी मौसम गर्म हो रहा है। इससे एनोफिल कलसिफेशिज मच्छर भी पहाड़ी क्षेत्र में पनपने में सक्षम हैं। प्रलाजमोडियम (प्रोटोजोआ) मच्छर की भी ज्यादा प्रजातियां प्रदेश में पाई जाने लगी हैं। औसतन 18 से 28 डिग्री और अधिकतम 30 से 32 डिग्री तापमान और नमी भी 50 से 80 फीसदी होने पर मलेरिया के मच्छर आसानी से पैर पसार सकते हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि मलेरिया के मच्छर के काटने पर आठ से नौ दिन के भीतर मलेरिया के लक्षण आते हैं। इस अवधि में अगर कोई अन्य मच्छर उस संक्रमित व्यक्ति को काट ले तो इससे मलेरिया फैलने का खतरा रहता है। व्यक्ति के शरीर में 15 दिन तक प्रलाजमोडियम रहता है। इसकी जांच बुखार आने के तुरंत बाद होनी आवश्यक है।

वहीं, जिला स्वास्थ्य कार्यक्रम अधिकारी डॉ. एके सिंह ने बताया कि जिन क्षेत्रों में डेंगू मच्छर पनप रहे हैं, वहां अब मलेरिया के मच्छर भी पैदा हो रहे हैं। जिन क्षेत्रों में ये मच्छर हाल ही में पैदा होने शुरू हुए हैं, वहां के लोगों को जागरूक करने के लिए शिविर लगाए जाएंगे।