आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द का जन्म 12 फ़रवरी सन् 1824 और वैदिक गणना अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की दसवीं तिथि को गुजरात के टंकारा गाँव मे हुआ था ।उनकी जयन्ती भी अन्य महापुरुषों के समान वैदिक गणना से तदनुसार इस वर्ष 8 मार्च को मनाई जा रही है । महर्षि दयानन्द सरस्वती की विचारधारा का आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।वेदों के प्रकाण्ड पंडित महर्षि दयानन्द ने मात्र ३३ वर्ष की आयु में ही स्वदेशी शासन सर्वोपरि का नारा देकर स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को ईंधन देने का कार्य किया था ।यह उनका ही प्रभाव था कि लाला लाजपत राय,सरदार भगत सिंह,पं० राम कुमार बिसमिल जैसे हज़ारों वीर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े थे।स्वामी विरजानंद से व्याकरण , वेदों और सच्चे ईश्वर का ज्ञान पाकर उन्होंने अपना जीवन गुरू के आदेश पर मानव कल्याण के लिए समर्पित करते हुए समाज में फैले वेद विरूद्ध पाखंड-अंधविश्वास व कुरीतियों को दूर करने के लिए लग गए।

महर्षि दयानन्द पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कन्याओं की शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित किया ,उनका मानना था कि कन्याओं को शिक्षित करना अत्याधिक आवश्यक है क्योंकि कन्याएँ शिक्षित हो कर एक नहीं बल्कि दो कुलों अर्थात् अपने कुल के साथ पति के कुल को भी तार देती हैं कह कर महिला सशक्तिकरण की शुरुआत की।आज पूरी दुनिया में हज़ारों आर्य समाजें व उनके नाम से दुनिया भर में 12000 से अधिक डी ए वी सहित शिक्षण संस्थान हैं जिनमें कन्या महाविद्यालय ,गुरुकुल ,विश्वविद्यालय,मेडिकल कालेज,कालेज ,स्कूल ,अनाथालय सम्मिलित हैं जिनमें वैदिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी प्रदान की जाती है।

सती प्रथा का पुरज़ोर विरोध करते हुए वे कहा करते कि पति की मृत्यु पर पत्नी को साथ चिंता में ज़िन्दा जलाना यदि धर्म है तो पत्नी की मृत्यु पर पति को इसी तरह क्यों न जला देना चाहिए ?अत:इस परम्परा का उन्होंने विरोध किया।इसी तरह समाज को विधवाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने की वकालत की तथा उनसे सामाजिक रूप में किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए तथा उन्हें भी स्वेच्छा से पुनर्विवाह का अधिकार होना चाहिए ।छुआ-छूत मिटाने के लिए भी स्वामी दयानन्द दृढ़ संकल्पित थे उनका मानना था जातियाँ जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर होती हैं तथा छुआ-छूत का विरोध किया ।
महर्षि दयानन्द ने वेदों का हिन्दी में भाष्य करने का कार्य भी शुरू किया ताकि आम लोग भी इस पावन ज्ञान से वंचित न रहें ।आज उनकी 197 वीं जयन्ती पर श्रद्धा सुमन भेंट करते हुए उनके बताये पावन मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए ।
——योग प्रकाश नन्दा,वरिष्ठ उप प्रधान,आर्य प्रतिनिधि सभा हिमाचल प्रदेश