रिंकू शर्मा धुमारवी/ हमारी ऐतिहासिक धरोहर और प्राचीन विरासत की परम्परा लगभग लुप्त हो रही है। आप देख रहे हैं जो कि पानी में लकड़ियां नज़र आ रही है, ये आज की पीढ़ी के लिए एक नई बात भले ही हो लेकिन 40 साल से ऊपर के लोगों की यादें इसे देख के यकीनन ताजा हो जाएगी। भैंस,गाये,बैल, के लिए चारा पत्तियां निकलने के बाद ये खनेरटे से एक जमाने में शेल निकाला जाता था।और फिर शेल से रस्सियां बनाई जाती थीं।

करीब पिछले 15 सालों से सड़क के लिए तरस रहा है…

जिसके लिए इनको खड्ड में तीन महीनों तक पानी में रखा जाता था, और उसके बाद इसकी छाल निकाल के रस्सियां बनाई जाती थीं, उन रस्सियो से पशुओं को बांधा जाता था। जोकि काफी मजबूत होती हैं। इसके पीटने के बाद जो लकड़ी बच जाती हुई, उसे आग जलाने में प्रयोग किया जाता था। आज कल यह हमारी भारतीय संस्कृति की परम्परा लुप्त होती जा रही है।